झांसी में स्थापित है लहर देवी, जहां भक्तों की मुराद होती है पूरी

0

झांसी : चैत्र मास के नवरात्र शुरू हो चुके हैं। चैत्र नवरात्र की सबसे खास बात यह होती है कि इसके प्रारंभ होने के साथ ही हिंदु नववर्ष की शुरुआत होती है। ऐसा कहा जाता है कि कोई भी समय हो अगर माता के दरबार में सच्चे मन से प्रार्थना की जाए तो वह जरूर पूरी हो जाती है। देवी मां के मंदिरों में एक ऐसा ही अनूठा मंदिर है बुंदेलखण्ड के झांसी में। सैंकड़ों साल पुराने इस मंदिर में आज भी भक्तों का तांता लगता है। इस मंदिर की कई पुरानी गाथाएं प्रसिद्ध हैं। इस मंदिर से जुड़ी एक गाथा आल्हा-ऊदल से जुड़ी हुई है।

इस गाथा में कहा गया है कि उन्होंने युद्ध जीतने के लिए बेटे इंदल की बलि दी थी। जिसे देवी मां ने स्वीकार कर उनके बेटे को पुनः जीवित कर दिया था। उस दिन के बाद से ही यहां पर इस माता की स्थापना हुई।

इस मंदिर में जो देवी स्थापित है उन्हें लहर देवी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की स्थापना बड़े लड़ैा महोबा वाले चंदेल योद्धाओं की ओर से की गई थी।

इस मंदिर के बारे में जानकारी देते हुए पुजारी ने इतिहास का जिक्र करते हुए कहा है कि देवी मां को मनिया देवी कहते हैं। पहले राजा और फिर सरदार जब कहीं भ्रमण के लिए जाया करते थे, जब अपने देवी-देवताओं को साथ लेकर चला करते थे। एक बार की बात है आल्हा-ऊदल अपने लाव लश्कर के साथ कहीं जा रहे थे।

उनका लश्कर झांसी में लंबी थकान के बाद रुका। सभी ने विश्राम किया बाद में जब चलने कि लिए हुए तो उनकी कुल देवी मनिया की मूर्ति यहां से नहीं उठी। काफी प्रयास के बाद भी देवी आगे नहीं बढ़ीं, तो इनको यहीं पर स्थापित कर दिया।

मंदिर के अंदर रखा हुआ है स्तंभ
वहीं, मंदिर परिसर में एक पत्थर रखा हुआ है, जो स्तंभ की भांति है। कहा जाता है कि उसी पत्थर पर इंदल की बलि चढ़ाई गई थी।

पहले यह पत्थर वहीं एक स्थान पर रखा हुआ था। इस पत्थर को अब गर्भ गृह के सामने मंदिर परिसर में रख दिया गया है। कहा जाता है कि इंदल की बलि के बाद से ही यहां पर बलि की भी परंपरा चली आ रही है। जिस किसी की मनोती पूरी हो जाती है, तो वह यहां पर बकरे की बलि चढ़ाता है। वैसे लोग अपने इच्छा अनुसार प्रसाद चढ़ा कर मनौती मांगते हैं।

Share.

About Author

Leave A Reply