ये हैं भगत सिंह के 10 नारे, जिन्हें पढ़कर आप में जाग जाएगा देशभक्ति का जज्बा

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शहीदों और महान नेताओं की जयंती या पुण्यतिथि महज रस्म-अदायगी का मौका नहीं, बल्कि उनके जीवन, कार्यों एवं संदेशों के समकालीन महत्व के रेखांकन का भी अवसर होती है. जिन मूल्यों और आदर्शों के लिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने शहादत दी तथा डॉ राम मनोहर लोहिया आजीवन संघर्षरत रहे, उन पर आज पहले के किसी दौर से अधिक हमला है. समाजवादी सिद्धांतों के अनुगामी भगत सिंह और डॉ लोहिया ने इस धारा में अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से अप्रतिम योगदान दिया है. इस प्रस्तुति के माध्यम से हम उन्हें याद कर रहे हैं.

जब 23 मार्च 1931 को उन्हें लाहौर की जेल में उन्हें फांसी दी जा रही थी तो उस दौरान भगत सिंह ने नारा दिया ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और इसके बाद वो मुस्कुराते रहे और देश के शहीद हो गए। आज हम आपको भगत सिंह के कुछ ऐसे ही नारे के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें पढ़कर आज भी आप में देशभक्ति का जज्बा जाग जाएगा।

भगत सिंह के नारे…

  • इंकलाब जिंदाबाद
  • साम्राज्यवाद का नाश हो।
  • राख का हर एक कण मेरी गर्मी से गतिमान है मैं एक ऐसा पागल हूं जो जेल में भी आज़ाद है।
  • ज़रूरी नहीं था की क्रांति में अभिशप्त संघर्ष शामिल हो, यह बम और पिस्तौल का पंथ नहीं था।
  • बम और पिस्तौल क्रांति नहीं लाते, क्रान्ति की तलवार विचारों के धार बढ़ाने वाले पत्थर पर रगड़ी जाती है।
  • क्रांति मानव जाति का एक अपरिहार्य अधिकार है। स्वतंत्रता सभी का एक कभी न ख़त्म होने वाला जन्म-सिद्ध अधिकार है। श्रम समाज का वास्तविक निर्वाहक है।
  • व्यक्तियो को कुचल कर, वे विचारों को नहीं मार सकते।
  • निष्ठुर आलोचना और स्वतंत्र विचार ये क्रांतिकारी सोच के दो अहम लक्षण हैं।
  • मैं एक मानव हूं और जो कुछ भी मानवता को प्रभावित करता है उससे मुझे मतलब है।
  • प्रेमी, पागल, और कवी एक ही चीज से बने होते हैं।
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