सुप्रीम कोर्ट: किसी को भी वयस्कों के विवाह में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं

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मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि दो बालिग जोड़े, जो प्यार में पड़ते हैं और शादी करना चाहते हैं अगर उन्हें माता-पिता, समाज और खाप पंचायत (सामुदायिक समूह), परेशान करता है या अपमानित करता है या किसी प्रकार की दखलंदाजी करता है तो ये बिल्कुल अवैध माना जाएगा.
इस फैसले के साथ अदालत ने ऑनर किल्लिंगस के खिलाफ एक विशिष्ट दंडात्मक कानून की कमी को भी पूरा कर दिया है
एनजीओ शक्ति वाहिनी द्वारा दायर की गई याचिका पर पिछले सुनवाई में, भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि किसी भी व्यक्ति, समूह या लोगों के पास किसी बालिग जोड़े को परेशान करने का अधिकार नहीं है.
अदालत ने कहा कि ये दो लोगों का मौलिक अधिकार है अगर वे एक दूसरे से शादी कर के शांतिपूर्ण ज़िन्दगी बिताना चाहते हैं.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि सिर्फ न्यायालयों को कानूनी रूप से फैसला करने का अधिकार है कि शादी सही है या नहीं या बच्चों का ये फैसला अनुचित है या नहीं. “कोई अन्य व्यक्ति या समूह” को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है.
खाप पंचायतों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकील ने इस बात पर आपत्ति जताई कि कैसे ऑनर किल्लिंगस को उकसाने के लिए पंचायतों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. उन्होंने तर्क दिया था कि 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 में एक ही गोत्र के लोगों के बीच विवाह के संबंध में आपत्ति की इजाजत दी गई है.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम परंपराओं, वंशों, आदि पर यहां निबंध नहीं लिख रहे हैं. हम केवल वयस्कों की आजादी की बात कर रहे हैं कि वे अपनी मर्ज़ी से बिना किसी परेशानी के, एक साथ शादी कर के रह सकते हैं.”
सरकार ने यह स्वीकार किया कि प्रचलित कानूनों के तहत “हॉनर किल्लिंगस” को किसी अपराध के रूप में अलग से परिभाषित या वर्गीकृत नहीं किया गया था. लेकिन अब इसको हत्या माना जाएगा, “सरकार ने बात अपने लिखित सुझावों में कहा
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